Monday, 9 September 2013
समय, समाज और कला
हेमन्त शेष*
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स्तंभकार एल्विन टॉफलर की एक चर्चित किताब ‘फ्यूचर शौक’ के अनुसार पूर्वी कनाडा में एक लड़का था- रिकी गैलेन्ट, जिसकी मृत्यु सिर्फ 11 साल की आयु में मार्च 1967 में हो गई थी, लेकिन यह मौत सामान्य मृत्यु नहीं थी। गैलेन्ट की मृत्यु के समय उसकी त्वचा पर इतनी सलवटें थीं जितनी 80 बरस में होती हैं। उसके बाल सफेद होकर उड़ चुके थे, दांत टूट गए थे। स्मरण-शक्ति कमजोर हो गई थी और शरीर की रक्तधमनियां सिकुड़ गईं थीं। रिकी गैलेन्ट एक असाधारण बीमारी से मौत के मुंह में गया था । नई बीमारी का नाम था- ’प्रोजीरिया’ - दो लैटिन शब्दों से मिल कर बनाया गया है-’प्रो’ और ’जीरिया’ याने वक्त से पहले वृद्ध हो जाने का रोग।
प्रोजीरिया इसी सदी की देन है, एक बहुत आश्चर्यजनक रोग, और चिकित्सकों का अनुमान है कि विश्व में आने वाले वक्त में ’प्रोजीरिया’ जैसी विलक्षण बीमारियों के और भी मामले प्रकाश में आ सकते हैं।
क्या ऐसा नहीं लगता कि हमारी वर्तमान सभ्यता समय, समाज और कला भी एक तरह की ‘प्रोजीरिया’ का शिकार है ?
हालांकि स्वभाव से मनुष्य को अपना हर आज गुजरे हुए कल की तुलना में ज्यादा परिवर्तनशील, कठिन और चुनौतीपूर्ण लगता रहा है, पर अगर वक्त से बाहर जाकर एक तटस्थ प्रेक्षक की तरह देख पाना संभव हो, तो भी यही कहा जा सकता है कि दुनिया के हर क्षेत्र में, इस सदी में, सभ्यता और सामाजिक-जीवन दोनों में उद्दाम और विलक्षण बदलाव आए हैं। मानव-सभ्यता के पिछले सौ-दो-सौ बरस, गति और प्रकृति दोनों ही दृष्टियों से असामान्य रफ्तार के वर्ष रहे हैं और यह गति दिनों-दिन बढ़ती ही जा रही है।
यह कुल्हड़ों का नहीं, प्लास्टिक के खतरनाक ‘थ्रो-अवे’ गिलासों का जमाना है, जो प्रकृति की पवित्रता को ध्वस्त कर के उसे अनश्वर कूड़े-कचरे के ढ़ेर में बदलते हैं । कई एवरेस्ट-अभियान तो केवल हिमालय की सर्वोच्च चोटी और उसके मार्ग में बिखरे टनों अनुपयोगी कचरे को वापस लाने के लिए ही आयोजित किए गए हैं ।
पोलिश कवि रादा पैन्चोव्स्का की एक कविता ’आधुनिक बर्बर’ की याद यहां आनी स्वाभाविक है।
19 वीं और 20 वीं सदी में विज्ञान, टेक्नोलॉजी, सामाजिक-दर्शन, कला, ज्ञान, जीवन-शैली सब में जो परिवर्तन हुए हैं, हो रहे हैं, उसकी पूर्व कल्पना कुछ सौ सालों पूर्व तक लगभग असंभव थी। विविध क्षेत्रों में हुए आविष्कारों के बहाने हम अपनी सदी की सभ्यता के भौतिक परिवर्तनों की इसी बात और गहराई से याद करें।
1903 में राइट ब्रदर्स द्वारा आविष्कृत दुनिया का पहला हवाई जहाज सिर्फ 59 सैकेण्ड्स तक ही हवा में रह पाया था. आज राकेट एक घंटे में औसतन 4800 मील की गति से अंतरिक्ष में उड़ता है, याने एक सैकेण्ड में लगभग 25 किलोमीटर। शनि के सब से बडे. उपग्रह ‘टाइटैनिक’ पर अन्तरिक्ष यान 'कैसिनी' से अलग हुए केप्सूल 'हेजन्स लैब' ने दो अरब दस करोड क़िलोमीटर की सौर-यात्रा कर जनवरी 2005 में शनि के दरवाजे पर मनुष्य के आविष्कार की दस्तक दे दी थी । अब तो अंतरिक्ष में भेजे गए ‘रोबो’ पृथ्वी के संचार केन्द्रों से बात भी कर रहे हैं ... कॉन्कोर्ड विमान हजारों किलोमीटर की दूरी आवाज से भी तेज रफ्तार से कुछ ही घंटों में तय करते हैं। सिर्फ स्केंडीनेवियन एयरलाइन्स में प्रतिवर्ष करीब सवा दो करोड़ से ज्यादा मुसाफिर हवाई यात्रा करते हैं। परिवहन-यातायात का यह दृश्य-परिवर्तन केवल 100 सालों में घटित हुआ है।
1870 में बिजली का पहला बल्ब पैरिस की वर्ल्ड साइन्स कांग्रेस की विज्ञान-प्रदर्शनी में प्रदर्शित किया गया था, जिसकी रोशनी मोमबत्ती की रोशनी से भी कम थी, पर आज दुनिया की कल्पना बिजली के बिना असंभव है। 1898 में बनी पहली कार- थी ‘टी-फोर्ड’ जो चलते ही एक नजदीकी खंभे से टकरा कर क्षतिग्रस्त हो गई थी। पर आज मोटर-रेस की कारें तो लगभग 500 कि.मी. प्रतिघंटा से भी तेज़ रफ्तार पकड़ती हैं। कोई पौने चार सौ साल पहले जर्मनी में आविष्कृत प्रिंटिंग प्रेस से दुनिया को छपे हुए शब्द का प्रथम परिचय हुआ था। पर आज अकेले यूरोप में रोज 1500 से ज्यादा विषयों पर नई किताबें हर दिन छपती हैं। याने साल भर में 5 लाख 57 हजार से भी ज्यादा, और अमेरिका, एशिया, आस्ट्रेलिया जैसे महाद्वीपों की किताबों की गणना तो अलग है।
मार्शल मैक्लुहान, जिन्होंने हमारे युग को कभी ’प्रिंट-एज’ कहा था, ने ही 1960 में पृथ्वी को एक ‘ग्लोबल-विलेज’ एक ‘विश्व-ग्राम’ की संज्ञा दी थी। ऐल्विन टॉफलर ने कभी प्रौद्योगिकी को ‘थर्ड-वेव’ कहा था, पर आज जैसे संसार एक ‘फोर्थ-वेव’, ’इलेक्ट्रॉनिक-वेव’ से संचालित हो रहा है।
अमेरिका में 1969 में फौज की सुविधा के लिए ’आर्पानेट’ परियोजना ने सैनिक-अनुसंधानों के लिए एक सीमित उद्देश्य से कम्प्यूटर नैटवर्किंग का विकास किया था। यों सामरिक वैज्ञानिकों ने सीमित कम्प्यूटर-नैटवर्किंग की शरूआत की थी, तब किसी को भी मालूम कहां था कि 1989 में ठीक दो दशकों के बाद, कम्प्यूटर नैटवर्किंग के रूप में संचार क्रांति और विश्व-ज्ञान का अत्यधिक लोकप्रिय माध्यम बन जाएगा।
डेविड हार्वे ने अपनी एक किताब में प्रसिद्ध साहित्यालोचक पाल वेलरी के उस साहित्यिक वक्तव्य को याद किया है, जो केवल ’माउस’ के क्लिक करने भर के श्रम से आपको दुनिया भर के ज्ञान-विज्ञान, टैक्स्ट, चित्रों, आवाजों से क्षण भर में जोड़ देता है। World Wide Web पर आज तीन अरब ६८ करोड़ से भी ज्यादा web पन्ने हैं जिन्हें आप अपने पूरे जीवन काल में नहीं देख सकते ! कम्प्यूटर सोफ्टवेयर में आ रहे बदलाव असाधारण हैं। यहां एक बार फिर संदर्भ ‘गति’ ही का है और गति आज का हमारा नया धर्म- ’युग-धर्म’ है ।
इन्टरनैट के चलते हमारी पृथ्वी अब सचमुच एक ‘ग्लोबल-साइबर-विलेज’ ही है। वैब केवल 15 साल पुराना है पर इसमें हर दिन हर क्षण कुछ न कुछ, नया कुछ क्रांतिकारी घटित हो रहा है। ‘बींइंग डिजीटल’ किताब में निकोलस नेग्रोपोन्ट ने पृथ्वी के एक ‘मीडिया-मशीन’ में तब्दील हो जाने की जो कल्पना 1995 में की थी, आज का यथार्थ उससे बहुत दूर कहां है?
कला के क्षेत्र में ’इन्टरनेट’ की बात करें । 1995 में ‘कला संबंधी’ वेब साइट्स लगभग 5000 ही थीं, आज वे कितनी लाख हैं- कोई नहीं जानता।
वैब-आर्ट: डिजीटल कला-
ऐतिहासिक भारतीय संदर्भ में राष्ट्रीय आधुनिक कला-दीर्घा और बम्बई के ’ब्रह्मा’ आर्ट ग्रुप की उस प्रदर्शनी की याद दिलाना जरूरी है जो 1994 में कुछ चित्रकारों के अलावा कम्प्यूटर कम्पनी के प्रयासों का परिणाम थी।
ऐपल मेकेन्टोश के एक कला संबंधी सोफ्टवेयर पर जिन 12 चित्रकारों को बम्बई में विधिवत् प्रशिक्षित कर कम्प्यूटर पर ’रचना’ करने के लिए प्रेरित किया गया था, उनमें हुसेन जैसे वरिष्ठ कलाकार की प्रतिक्रिया याद रखने लायक थी: ’कम्प्यूटर ने कला में पहली बार इस बात की संभावना पैदा की है कि सोचने और रचने के बीच की दूरी कम हुई है और अब मैं शायद उसी ’गति’ से चित्र बना सकता हूं जिस रफ्तार से मैं चित्र बना के बारे में सोचता हूं।’
अगर कोई चित्रकार इस माध्यम में अपने जौहर दिखलाना चाहे तो उसके लिए कम्प्यूटर एक बेहद उत्तेजक इलेक्ट्रॉनिक कैनवास साबित हो सकता है, बशर्ते आप कम्प्यूटर सॉफ्टवेयर प्रोग्रामों की विविधता और उसकी तकनीकों से अच्छी तरह परिचित हों। अगर ग्राफिक डिजाइनिंग, टाइपोग्राफी, ऐनीमेशन, वीडियो, ऑडियो, हाइपरटैक्ट और मल्टीमीडिया प्रोग्रामों में आपकी गति हो और आप हर दिन बदलने वाले नए, आविष्कारों और दिनों दिन बदलती बढ़ती उनकी क्षमताओं से परिचित रह सकें।
’ऑनलाइन आर्ट’, ‘वैब आर्ट’ या ‘डिजीटल आर्ट’ के प्रति दिलचस्पी बढ़ रही है। न्यूयार्क विश्वविद्यालय के इन्टरऐक्टिव टैलीकम्यूनिकेशन्स प्रोग्रामों में भाग लेने और नई डिजीटल आर्ट तकनीकों को सीखने में सबसे मेधावी छात्रों की रुचि सबसे ज्यादा है। बहुत से अमेरिकन और यूरोपीय विश्वविद्यालयों में डिजीटल मीडिया सेन्टर, समीक्षकों, कला-कर्मियों, कला-समूहों और चित्रकारों के साथ मिल कर बेहद उत्तेजक रचनात्मक काम कर रहे हैं।
हमारे समय और समाज का सबसे उत्तेजक पक्ष ये है कि कलाएँ अपना पारंपरिक स्पेस छोड़ कर नए अनुभवों की तरफ जा रही हैं.
लगभग ५० साल पहले एक आधुनिक कला प्रदर्शनी को शीर्षक दिया गया था- “आधुनिक कला के बीस हज़ार साल!”
अगर कोई चित्रकार धरती पर चार-पांच मील लम्बी लम्बी लकीरें खींचे और आप से कुछ हज़ार फिट ऊपर हवाई जहाज़ से उन्हें एक कलाकृति के रूप में देखने को कहे तो क्या आप को आश्चर्य होगा? भारत के लिए ऐसे प्रयोग सिर्फ कल्पना भर हैं पर ‘एन्वोयरमेंटल आर्ट’ के रूप में सन १९६०-७० के दशकों में रिचर्ड लॉन्ग (१९४५) जैसे चित्रकार ने ऐसा किया था- पृथ्वी को ही केनवास के रूप में काम लेने वालों का दौर कला में रहा है!
इसी तरह कलाकार क्रिस्टो और जेनी क्लौड ने अपनी कलाकृति के रूप में बड़ी बड़ी और संसार की कई प्रसिद्ध बिल्डिंगों तक को जब विशाल पोलिथीन शीट्स में लपेटा बाँधा और प्रदर्शित किया था तब भी यह कला की एक रचनात्मक छलांग ही मानी गयी थी. यहाँ ‘सोफा गोज़ टू प्लेसज़’ की याद आना भी स्वाभाविक है- जो फोटोग्राफी का एक और बेहतरीन प्रयोग था !
यहाँ सवाल यह खड़ा हो सकता है कि क्या किसी क्षेत्र, किसी देश की कला को उस देशकाल का साक्ष्य भी अपनी रचना में देना ही चाहिए, जिसकी कि स्वाभाविक उपज वह है ?
प्रख्यात भारतीय मूर्तिशिल्पी रामकिंकर बैज के शब्दों को याद करें तो “सिर्फ हवाई जहाज ही अन्तर्राष्ट्रीय हो सकते हैं, क्योंकि उनकी जड़ें नहीं होतीं। कला की जड़ें होनी चाहिएं ।’
क्या यह वक्तव्य एक समाज या राष्ट्र की सब ललित कलाओं पर भी यथावत् लागू नहीं होता ? आज परिवर्तनों की आंधी के प्रसंग में क्या संगत हैं भारतीय कला, चीनी कला, अमेरिका कला जैसी धारणाएं ? यूनेस्को कूरियर के निदेशक, रीने लीफोर्ट के अनुसार- “अब कला में ’राष्ट्रवाद’ की कल्पना अब काफी हद तक अर्थहीन है, क्योंकि एक अच्छी कलाकृति की बिक्री के लिए यह बात कोई मायना ही नहीं रखती कि वह किस देश के कलाकार की रचना है? ’’
रामकिंकर बैज की चिन्ता के विपक्ष में यह कठिनाई सबसे अहम् है कि एच.जी. वेल्स के वैज्ञानिक उपन्यास में वर्णित ऐसी कोई टाइम मशीन’ निश्चय ही हमारे पास नहीं है - जो हमें जीवन जीने के उन पुराने तौर-तरीकों में लौटा सके। न हम पुराने तरह की रचना को आदर्श मान सकते हैं न पुराने सौंदर्यशास्त्र को... कला में हम 'यहाँ और अभी' के नागरिक हैं. हम आज को ज्यादा तरजीह देते हैं।
हमारे अपने रसोईघरों में कुछ ही सालों में आए ईंधन संबंधी बदलाव आखिर क्या कथा कह रहे हैं ? याद करें - लकड़ी, गोबर के चूल्हे से कोयले की अंगीठी, से प्रेशर-स्टोव, अब एल.पी.जी., इलेक्ट्रिकल ओवन और इलेक्ट्रोनिक कुकिंग-रेंज तक का सफ़र ।
ग्लोबलाइजेशन और ग्लोबलिज्म
भूमण्डलीकरण का श्रेय जिन नई तकनीकों और प्रविधियों को दिया जा सकता है उनमें दो आविष्कार हैं- एक तो कम्प्यूटर और दूसरा सूचना-प्रौद्योगिकी। दोनों एक-दूसरे से जुड़े हैं। दोनों का विकास और विस्तार एक दूसरे से संभव हुआ है । इन दोनों के सहारे एक नया इलेक्ट्रॉनिक विश्व-समाज बहुत ही तेजी से बन रहा है और दुनिया का प्रायः हर देश, जिसमें भारत भी शामिल है, आधुनिकीकरण और नए प्रौद्योगिक बदलावों की इस दौड़ में शामिल है।
भूमण्डलीकरण का प्रसार ज्यामितिक अनुपात में हो रहा है और यह विचार अर्थतंत्रों और संस्कृति को लगातार प्रभावित कर रहा है। क्या ग्लोबलाइजेशन और ग्लोबलिज्म एक ही हैं? हालांकि वैश्वीकरण और भूमण्डलीकरण ऊपर से दो भिन्न धाराएं या अलग धारणाएं नहीं दिखतीं, पर ग्लोबलाइजेशन और ग्लोबलिज्म दो अलग-अलग प्रत्यय हैं। इन दोनों का उत्स एक है कि ’पृथ्वी एक ग्लोब है’, दोनों अपने आप में एक-दूसरे से जुड़ी हुई हैं, हालांकि वे एक-दूजे की’पर्यायवाची’ नहीं हैं ।
अपनी एक किताब “द लेक्सेस एंड द ऑलिव ट्री” में आधुनिक समाज-चिंतक टॉमस फ्रीडमेन ’ग्लोबलिज्म’ को वह नयी मानवतावादी ’विश्व-व्यवस्था’ मानते हैं, जो वाम और दक्षिण के परम्परागत शीतयुद्ध का स्थान ले रही है । यह नया विश्व दृष्टिकोण दो महत्वपूर्ण अन्तर्राष्ट्रीय राजनीतिक घटनाओं से भी संभव हुआ है: पहला बर्लिन की दीवार का घ्वंस और दूसरा सोवियत रूस का विखण्डन । बर्लिन की दीवार का मामला जहां साम्यवाद पर जनतांत्रिक पूंजीवाद की विजय का संकेतक है, वहीं सोवियत रूस के टुकड़े हो जाना साम्यवादी-विचारधारा पर आधारित एक तथाकथित समतावादी समाज के राजनैतिक अन्तर्विरोधों का प्रतिफलन। भूमण्डलीकरण की धारणा आधुनिक पूंजीवाद की उपज है। इस प्रक्रिया को जिस बात ने सब से ज्यादा संभव किया है, उनमें आधुनिक तकनीक, विज्ञान और संचार संसाधनों के क्षेत्र में घटित क्रांति ही है, जिसने समाजों और राष्ट्रों को पूरी तरह एक-दूसरे पर निर्भर बनाते हुए हमारी परम्परागत संस्कृति, सामाजिक व्यवस्थाओं, जीवन-शैलियों और पर्यावरण के सामने कई नई चुनौतियां भी उपस्थित की हैं ।
आधुनिक होने का मायना
आधुनिक होने का एक मायना समकालीन सभ्यता के यथार्थ को उपयोग में लेने, उसे ग्रहण करने और उसके साथ अपनी परम्परा, अपने विवेक, अपनी मूल्य-दृष्टि और अपने वैविध्य को बचाते हुए उससे संतुलन और सामन्जस्य बिठाने का है। भू-मण्डलीकरण अगर हमारी अपनी जातीय-स्मृति, वैविध्य और परम्परा की रक्षा के लिए एक गंभीतर प्रश्न है, तो अपनी निजता, बहुलता और विविधता को बचाए रखना भी आज का एक यक्ष-प्रश्न ।
‘वन डायमेंशनल वर्ल्ड’ के प्रसार की आंधी में देखना यह है कि बदलती हुई कला की दुनिया में क्या हम, हमारा हिन्दुस्तानी कला समाज हमारी ललित कलाएँ वैज्ञानिक आविष्कारों से रोज़ बदल रही नयी ‘डिजीटल तकनीकों’ से विमुख रह पाएंगे ? अगर हाँ तो कैसे – और अगर नहीं तो हमें उनके बदले हुए रूपों को स्वीकारना और सराहना होगा क्यों कि माध्यमों में आ रहे असाधारण परिवर्तन स्वाभाविक तौर पर हमारी ललित कलाओं को भी नित नए बदलाव की चौखट पर खड़ा कर रहे हैं. वे कलाएँ जो भूत, भविष्य और वर्तमान के बीच सबसे भरोसेमंद सांस्कृतिक पुल हैं.... यों भारतीय मनीषी प्रारंभ से ही ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ के दर्शन के अनुसार पृथ्वी को, एक ही परिवार के रूप में देखते आए हैं।
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